मंदिर में परिक्रमा विषम संख्या में ही क्यों की जाती है? जानिए धार्मिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व

भारतीय सनातन परंपरा में मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है, बल्कि यह सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक शांति और ईश्वर से जुड़ने का माध्यम भी माना जाता है। मंदिर में प्रवेश करने से लेकर भगवान के दर्शन और आरती तक हर क्रिया का अपना विशेष महत्व होता है। इन्हीं महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है मंदिर की परिक्रमा करना

आपने अक्सर देखा होगा कि मंदिर में भक्त भगवान की मूर्ति, शिवलिंग, तुलसी या पूरे मंदिर की परिक्रमा करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि परिक्रमा अधिकतर विषम संख्या, जैसे 1, 3, 5, 7, 11 या 21 बार ही क्यों की जाती है? आखिर इसके पीछे कौन-सा धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपा हुआ है?

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि मंदिर में परिक्रमा विषम संख्या में ही क्यों की जाती है और इसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

परिक्रमा का क्या अर्थ है?

परिक्रमा शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘परि’ अर्थात चारों ओर और ‘क्रम’ अर्थात चलना। इसका अर्थ है किसी पवित्र वस्तु, स्थान या देवता के चारों ओर श्रद्धा और भक्ति के साथ घूमना।

सनातन धर्म में यह माना जाता है कि भगवान ब्रह्मांड के केंद्र हैं और भक्त जब उनकी परिक्रमा करता है तो वह अपने जीवन का केंद्र ईश्वर को मानता है। यह समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक है।

मंदिर में परिक्रमा करने की परंपरा कब से चली आ रही है?

परिक्रमा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। वेदों, पुराणों और अनेक धार्मिक ग्रंथों में परिक्रमा का उल्लेख मिलता है। प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनि, साधु और भक्त मंदिरों, पर्वतों, नदियों और तीर्थस्थलों की परिक्रमा करते रहे हैं।

गोवर्धन परिक्रमा, नर्मदा परिक्रमा, गिरिराज परिक्रमा और मंदिर परिक्रमा आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है।

विषम संख्या का धार्मिक महत्व

सनातन धर्म में विषम संख्याओं को अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से 1, 3, 5, 7, 9, 11 और 21 जैसी संख्याएं धार्मिक कार्यों में अधिक उपयोग की जाती हैं।

1. विषम संख्या को अनंत का प्रतीक माना गया है

सम संख्या को पूर्ण और स्थिर माना जाता है, जबकि विषम संख्या निरंतर वृद्धि और आगे बढ़ने का संकेत देती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ईश्वर अनंत हैं और उनकी कृपा भी असीमित है। इसलिए विषम संख्या को आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है।

2. त्रिदेव और त्रिगुण से संबंध

संख्या 3 का संबंध ब्रह्मा, विष्णु और महेश से है। इसी प्रकार सृष्टि के तीन गुण – सत्व, रज और तम – भी तीन संख्या का महत्व बताते हैं। इसलिए तीन परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।

3. पंचतत्व का प्रतिनिधित्व

संख्या 5 पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश अर्थात पंचतत्वों का प्रतिनिधित्व करती है। पांच परिक्रमा करने से व्यक्ति अपने शरीर और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।

4. सप्तलोक और सप्तऋषि

संख्या 7 का संबंध सात लोक, सात ऋषि और सात चक्रों से माना गया है। सात परिक्रमा आध्यात्मिक ऊर्जा को जागृत करने का प्रतीक मानी जाती है।

विषम संख्या में परिक्रमा करने के पीछे आध्यात्मिक कारण

सकारात्मक ऊर्जा का संचार

मंदिरों का निर्माण विशेष वास्तु और ऊर्जा केंद्रों को ध्यान में रखकर किया जाता है। गर्भगृह में स्थापित देव प्रतिमा से सकारात्मक ऊर्जा निकलती है। जब भक्त परिक्रमा करता है तो यह ऊर्जा उसके शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव डालती है।

ईश्वर के प्रति समर्पण

परिक्रमा का अर्थ है कि भगवान हमारे जीवन के केंद्र हैं और हम उनके चारों ओर घूमने वाले ग्रहों की तरह हैं। विषम संख्या में परिक्रमा इस समर्पण को और अधिक मजबूत बनाती है।

कर्मों की शुद्धि

धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा से की गई परिक्रमा व्यक्ति के पापों को कम करती है और उसके मन को शुद्ध बनाती है।

विषम संख्या के पीछे वैज्ञानिक दृष्टिकोण

आज विज्ञान भी मानता है कि धार्मिक परंपराओं के पीछे गहरे मनोवैज्ञानिक और शारीरिक कारण होते हैं।

1. मानसिक एकाग्रता बढ़ती है

जब कोई व्यक्ति एक निश्चित संख्या में परिक्रमा करता है, तो उसका ध्यान पूरी तरह भगवान पर केंद्रित हो जाता है। इससे मन शांत होता है और तनाव कम होता है।

2. शरीर को हल्का व्यायाम मिलता है

मंदिर की परिक्रमा धीरे-धीरे चलकर की जाती है, जिससे शरीर को हल्का व्यायाम मिलता है। इससे रक्त संचार बेहतर होता है।

3. सकारात्मक सोच का विकास

धार्मिक वातावरण, मंत्रोच्चार और ध्यान के कारण व्यक्ति के मस्तिष्क में सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं।

4. ऊर्जा का संतुलन

आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार परिक्रमा करने से शरीर की ऊर्जा संतुलित होती है और मन में शांति आती है।

अलग-अलग देवताओं की परिक्रमा संख्या

भगवान गणेश

भगवान गणेश की सामान्यतः तीन या पांच परिक्रमा की जाती है।

भगवान विष्णु

भगवान विष्णु की चार या अधिक विषम संख्या में परिक्रमा की जाती है, हालांकि कई स्थानों पर तीन परिक्रमा भी प्रचलित है।

मां दुर्गा

मां दुर्गा की सात परिक्रमा को अत्यंत शुभ माना जाता है।

तुलसी माता

तुलसी की सामान्यतः तीन, पांच, सात या ग्यारह परिक्रमा की जाती है।

पीपल वृक्ष

पीपल वृक्ष की सात या ग्यारह परिक्रमा करने का विशेष महत्व बताया गया है।

शिवलिंग

शिवलिंग की परिक्रमा सामान्य परिक्रमा से थोड़ी अलग होती है। शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा कई स्थानों पर नहीं की जाती, बल्कि जल निकासी स्थान से पहले ही वापस लौटने की परंपरा है।

विषम संख्या को शुभ क्यों माना जाता है?

सनातन धर्म में अधिकांश शुभ कार्य विषम संख्या में किए जाते हैं। उदाहरण के लिए—

  • 11 दीपक जलाना।
  • 21 नारियल चढ़ाना।
  • 51 रुपये का दान देना।
  • 108 बार मंत्र जाप करना।
  • 7 फेरे लेना।

यह दर्शाता है कि विषम संख्याओं को आध्यात्मिक उन्नति और शुभता का प्रतीक माना गया है।

क्या सम संख्या में परिक्रमा करना गलत है?

धार्मिक दृष्टि से सम संख्या में परिक्रमा करना कोई पाप नहीं माना जाता, लेकिन परंपरा और शास्त्रों के अनुसार विषम संख्या अधिक शुभ मानी गई है। इसलिए अधिकतर भक्त विषम संख्या में ही परिक्रमा करते हैं।

परिक्रमा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

श्रद्धा और भक्ति के साथ परिक्रमा करें।

जल्दीबाजी न करें।

मन में नकारात्मक विचार न रखें।

भगवान का स्मरण करते हुए परिक्रमा करें।

मोबाइल या बातचीत में ध्यान न भटकाएं।

शांत मन से परिक्रमा करें।

परिक्रमा का जीवन में महत्व

परिक्रमा केवल धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह हमें यह संदेश देती है कि जीवन में अहंकार छोड़कर ईश्वर को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। जब हम भगवान को अपने जीवन का केंद्र मानते हैं, तब हमारे जीवन में सकारात्मकता, शांति और संतुलन आता है।

परिक्रमा हमें धैर्य, अनुशासन और आत्मसमर्पण का पाठ भी सिखाती है। यही कारण है कि सनातन धर्म में परिक्रमा को विशेष महत्व दिया गया है।

निष्कर्ष

मंदिर में परिक्रमा विषम संख्या में करने की परंपरा केवल एक धार्मिक नियम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक महत्व छिपा हुआ है। विषम संख्या को अनंत, विकास, सकारात्मक ऊर्जा और ईश्वर की कृपा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि मंदिरों, तुलसी, पीपल और विभिन्न देवताओं की परिक्रमा अधिकतर विषम संख्या में ही की जाती है।

यदि श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक भाव के साथ परिक्रमा की जाए तो यह मन, शरीर और आत्मा तीनों के लिए लाभकारी मानी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मंदिर में परिक्रमा क्यों की जाती है?

भगवान के प्रति श्रद्धा, समर्पण और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए परिक्रमा की जाती है।

2. परिक्रमा हमेशा विषम संख्या में ही क्यों की जाती है?

विषम संख्या को शुभ, अनंत और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना गया है।

3. क्या सम संख्या में परिक्रमा करना अशुभ होता है?

नहीं, लेकिन धार्मिक परंपरा में विषम संख्या अधिक शुभ मानी जाती है।

4. परिक्रमा करते समय क्या बोलना चाहिए?

भगवान का नाम, मंत्र या मन ही मन प्रार्थना कर सकते हैं।

5. तुलसी की कितनी परिक्रमा करनी चाहिए?

आमतौर पर तीन, पांच, सात या ग्यारह परिक्रमा की जाती है।

6. पीपल की परिक्रमा का क्या महत्व है?

पीपल की परिक्रमा से पुण्य प्राप्त होने और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ने की मान्यता है।

7. क्या रोज मंदिर की परिक्रमा करनी चाहिए?

यदि संभव हो तो रोज करना शुभ माना जाता है।

8. शिवलिंग की परिक्रमा कैसे की जाती है?

शिवलिंग की पूर्ण परिक्रमा नहीं की जाती और जल निकासी स्थान को पार नहीं किया जाता।

9. क्या परिक्रमा करने से मन शांत होता है?

हाँ, इससे मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ती है।

10. परिक्रमा का वैज्ञानिक लाभ क्या है?

यह हल्का व्यायाम प्रदान करती है और तनाव कम करने में सहायक होती है।

11. क्या महिलाएं परिक्रमा कर सकती हैं?

हाँ, महिलाएं भी श्रद्धा और भक्ति के साथ परिक्रमा कर सकती हैं।

12. एक दिन में कितनी बार परिक्रमा करनी चाहिए?

यह व्यक्ति की श्रद्धा और धार्मिक परंपरा पर निर्भर करता है, लेकिन विषम संख्या में परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।